बांके बिहारी जी की लीला अपरम्पार है
आनंद नाम का एक लड़का रेलगाड़ी में साफ-सफाई करता था और उससे मिलने वाले पैसों से अपने घर का गुजारा करता था। उसके परिवार में एक बूढ़ी माँ, एक छोटी बहन और बीमार पिता थे।
एक दिन गाड़ी में सीटों के नीचे सफाई करते समय उसे एक पर्स मिला। पर्स हाथ में आते ही उसके हाथ कांपने लगे। उसे लगा कि इसमें बहुत सारे पैसे होंगे। उसने झटपट पर्स उठाकर अपनी जेब में डाल लिया। वह बेसब्री से गाड़ी रुकने का इंतज़ार करने लगा ताकि देख सके कि इसमें कितने पैसे हैं। वह उन पैसों से घर के लिए राशन और पिता के लिए दवाई लेना चाहता था।
स्टेशन आते ही वह उतरा और एक एकांत जगह जाकर पर्स खोला। देखते ही उसके होश उड़ गए; पर्स बिल्कुल खाली था। उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। तभी पर्स की पिछली जेब में उसे एक भगवान की तस्वीर दिखी। उस तस्वीर को देखते ही उसके भीतर एक अजीब सी हलचल हुई और उसकी आँखों से दो मोटे आँसू निकलकर तस्वीर के चरणों में जा गिरे। ये आँसू खाली पर्स के दुख के थे या उस छवि के प्रति भक्ति के, वह समझ न पाया।
वह थके हुए कदमों से घर की ओर चल दिया। वह सोच रहा था कि आज घर में खाने को कुछ नहीं है, माँ-बहन भूखी हैं और पिता को दवाई के लिए भोजन चाहिए। तभी गली के नुक्कड़ पर एक सेठ शादी का बचा हुआ खाना बाँट रहा था। आनंद भी लाइन में लग गया और उसे खाने के दो-तीन पैकेट मिल गए। वह बहुत खुश हुआ। घर जाकर जब उसने माँ को खाना दिया, तो माँ ने बताया कि बहन भूख से रो रही थी।
आनंद हैरान था कि जो सेठ उसे देखकर मुँह सिकोड़ता था, आज उसने खुद उसे खाना दिया। उसने जेब से वह तस्वीर निकाली और भगवान का धन्यवाद किया। अगले दिन आनंद को स्टेशन पर एक बीमार वृद्धा मिली। उसने आनंद को टिकट लाने के लिए 500 रुपये दिए। जब आनंद टिकट लेकर लौटा, तब तक गाड़ी चलने लगी थी। उसने खिड़की से वृद्धा को टिकट थमाया, पर बाकी के 275 रुपये उसके हाथ में ही रह गए। वृद्धा ने इशारा किया कि वह पैसे आनंद रख ले। आनंद ने उन पैसों से हफ्ते भर का राशन खरीदा। उसे यकीन होने लगा कि यह सब उस तस्वीर वाले भगवान का चमत्कार है।
जब उसने माँ से पूछा कि ये कौन से भगवान हैं, तो माँ राशन देखकर इतनी खुश थी कि उसने ध्यान नहीं दिया। कुछ दिन बाद ट्रेन में सफाई करते समय उसने कुछ भक्तों को उसी तस्वीर के साथ 'हरे कृष्ण' का जाप करते देखा। पूछने पर एक महिला ने बताया, "बेटा, ये बांके बिहारी जी हैं। ये वृन्दावन के मालिक हैं और सबकी मनोकामना पूरी करते हैं।" आनंद ने भी वृन्दावन जाने की जिद की और वह उनके साथ चल दिया।
वृन्दावन पहुँचकर आनंद लोगों से बिहारी जी का पता पूछने लगा। एक सज्जन उसे मंदिर ले गए। मंदिर में भारी भीड़ थी। आनंद को दूर से ही बिहारी जी की झलक मिली और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। तभी मंदिर की बत्ती (लाइट) चली गई। अंधेरे में उसे एक दिव्य रोशनी दिखी और महसूस हुआ कि कोई उसका हाथ खींच रहा है। एक छोटे बालक ने उसे कोने में ले जाकर कहा, "आनंद, मैं कब से तुम्हारी राह देख रहा हूँ।"
आनंद घबरा गया। बालक बोला, "मैं वही हूँ जिसकी तस्वीर तुम जेब में लिए घूमते हो। जिस दिन तुम्हारे आँसुओं ने मेरे पैर धोए थे, उसी दिन से तुम मेरी शरण में हो।" आनंद को अपने परिवार की चिंता हुई, तो बिहारी जी बोले, "चिंता मत कर। जिस बस्ती में तुम रहते थे, वहाँ एक सेठ को मंदिर बनाना था। उसने तुम्हारी झोपड़ी के बदले तुम्हारे परिवार को पक्का घर और खाने का प्रबंध कर दिया है। अब तुम यहीं रहो और मेरे लिए फूलों की माला बनाया करो।"
जब आनंद ने आँखें खोलीं, तो बालक गायब था और बिहारी जी अपनी जगह विराजमान थे। आनंद की आँखों से अश्रुधारा बह निकली और वह 'बांके बिहारी लाल की जय' पुकारने लगा।

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