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अबकी बार होलिका दहन पर भद्रा का है साया, केवल 3 घंटे 11 मिनट का मुहूर्त रहेगा उत्तम

अबकी बार होलिका दहन पर भद्रा का है साया, केवल 3 घंटे 11 मिनट का मुहूर्त रहेगा उत्तम

Holika Dahan 2026 Timing | Holi Kab Jalegi: होली 2026 पर चंद्रग्रहण और भद्रा काल का प्रभाव रहने वाला है। 3 मार्च को चंद्रग्रहण होने की वजह से होलिका दहन को लेकर लोगों में कन्फ्यूजन है। 2 मार्च को पूर्णिमा तिथि के साथ ही भद्रा भी लग रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं कि होलिका दहन का शुभ मुहूर्त क्या है।

होलिका दहन हर साल फाल्गुन महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस साल फाल्गुन पूर्णिमा तिथि दो दिन लग रही है। 2 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा तिथि लग रही है जो अगले दिन 3 मार्च की शाम तक रहेगी। लेकिन प्रदोष कल लगने से पूर्व ही पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। होलिका दहन को लेकर एक तो तिथियों की ऐसी उलझन है दूसरी ओर भद्रा का साया भी पूर्णिमा तिथि के साथ बना रहने वाला है। ऐसे में इस साल होलिका दहन को लेकर ज्योतिषियों में भी अलग-अलग मत हैं।

पं. राकेश झा के अनुसार, होलिका दहन को लेकर धर्मसिंधु नामक ग्रंथ में बताया गया है कि- सा प्रदोषव्यापिनी भद्रारहित ग्राह्या यानी पूर्णिमा तिथि में भद्ररहित काल में होलिका दहन किया जाना चाहिए। होलिका दहन के लिए यह प्रथम नियम है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तिथि में भद्रारहित प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाना चाहिए।

होलिका दहन 2026 महत्वपूर्ण जानकारी

होलिका दहन2 मार्च 2026
होलिका दहन मुहूर्त (होली कब जलेगी)
शाम 6 बजकर 22 मिनट से 9 बजकर 33 मिनट
पूर्णिमा तिथि की शुरुआत2 मार्च, 5 बजकर 56 मिनट
पूर्णिमा तिथि की समाप्त3 मार्च, शाम 5 बजकर 8 मिनट
भद्रा काल आरंभ2 मार्च, शाम 5 बजकर 56 मिनट
भद्रा काल समाप्त3 मार्च, सुबह 5 बजकर 32 मिनट

लेकिन अगर दोनों दिन पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो और दोनों ही दिन प्रदोष काल को पूर्णिमा तिथि स्पर्श कर रही हो तो पहले ही दिन भद्रारहित प्रदोष काल में होलिका दहन कर लेना चाहिए। लेकन इस बार होलिका दहन पर यह भी पेंच है कि पहले दिन यानी 2 मार्च को पूर्णिमा तिथि शाम में 5 बजकर 56 मिनट से लग जा रही है और इसी के साथ भद्रा भी लग जा रही है। और भद्रा पर समाप्त हो रही है।

जबकि पूर्णिमा तिथि 3 मार्च को शाम में प्रदोष काल लगने से पहले ही शाम 5 बजकर 8 मिनट पर समाप्त हो रही है। ऐसे में शास्त्रविहित नियम के अनुसार भद्रामुख और पुच्छ को त्यागकर 2 मार्च को ही भद्राकल में होलिका दहन किया जाना चाहिए।

भद्रापुच्छ का समय होलिका दहन पर रात 12 बजकर 50 मिनट से 2 बजे तक होगा। जबकि भद्रा मुख जिससे सबसे ज्यादा वर्जित माना गया है वह समय 2 मार्च को निशीथ काल के बाद रात 2 बजकर 38 मिनट से सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक होगा। ऐसे में होलिका दहन का शुभ समय 2 मार्च को प्रदोष काल में शाम 6 बजकर 22 मिनट से 9 बजकर 33 मिनट के बीच किया जाना उत्तम होगा।

भद्रा मुख में होलिका दहन से क्या होता है

होलिका दहन पर भद्रा से बचने की सलाह दी जाती है। इसमें भी भद्रामुख कल में होलिका दहन सबसे अशुभ माना गया है। ऐसी मान्यता है कि भद्रा जो शनि की बहन है सर्प रूप में तीनों लोक में विचरण करती है। वह शुभ कार्य में विघ्न डालती है। ऐसे मे भद्रामुख काल में होलिका दहन करने से क्षेत्र विशेष में कुछ न कुछ अप्रिय घटना घटित होती है। इसलिए शुभ फल की प्राप्ति के लिए भद्रा से रहित और विशेष रूप से भद्रामुख से रहित काल में होलिका दहन करने का विधान है।

नहाय खाय के साथ शुरू हो चुका है आस्था का महापर्व, इन गीतों के बिना अधूरी है छठ पूजा

नहाय खाय के साथ शुरू हो चुका है आस्था का महापर्व, इन गीतों के बिना अधूरी है छठ पूजा
यानी 25 अक्टूबर से छठ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है। दूसरे दिन खरना किया जाता है और तीसरा दिन छठ पूजा की जाती है। चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद इस व्रत का पारण किया जाता है। इस महापर्व के चार दिनों में भगवान सूर्य और छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है। आइए सुनते हैं छठ पूजा के लोकप्रिय गीत।

नई दिल्ली। छठ का व्रत मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा अपनी संतान और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। जब बात होती है छठ पर्व की, तो सबसे पहले छठ के गीत जेहन में घूम जाते हैं। लोकगीतों के बिना छठ का महापर्व अधूरा है। ऐसे में हम आपके लिए लेकर आए हैं, छठ के कुछ प्रसिद्ध गीत (chhath puja song), जिनकी मदद से आप छठ पूजा के माहौल को और भी भक्तिमय बना सकते हैं।
नहाय खाय के साथ शुरू हो चुका है आस्था का महापर्व, इन गीतों के बिना अधूरी है छठ पूजा
छठ पूजा के लोकप्रिय गीत (Chhath Puja 2025 songs)
1. छठ गीत - केलवा के पात पर (Kelwa Ke Paat Par) एक प्रसिद्ध छठ गीत है, जिसे शारदा सिन्हा द्वारा गाया गया है। यह गाना टी-सीरीज द्वारा प्रोड्यूस किया गया है। यह गीत छठ पूजा के भक्तिमय माहौल को और भी भक्तिमय कर देता है। आइए सुनते हैं यह गीत 

2. गीत - (Pahile Pahil Chhathi Maiya)। यह गीत भी शारदा सिन्हा द्वारा ही गाया गया है, जिसे प्रड्यूज किया गया है वर्डवाइड रिकार्ड भोजपुरी ने। छठ का यह गीत भी काफी लोकप्रिय है, जो छठ महापर्व के सरल और सांसारिक संबंध को दर्शाता है। आइए सुनते हैं यह गीत 

3. गीत - आदित मनैला (Aadit Manaila)। छठ के इस गीत को शारदा सिन्हा और अनुराधा पौडवाल द्वारा गाया गया है। जिसे प्रोड्यूस टी-सीरीज भक्ति सागर ने किया है। यह गीत भी छठ पूजा के प्रसिद्ध गीतों में शामिल है। आइए सुनते हैं छठ का यह भक्तिमय गीत 

4. गीत -  हो दीनानाथ (Ho Deenanath), छठ का यह लोकप्रिय गीत भी अनुराधा पौडवाल और शारदा सिन्हा द्वारा गाया गया है। जिसे प्रोड्यूस किया गया है टी-सीरीज भक्ति सागर ने। यह गीत भी छठ महापर्व में भक्ति के रंग भरने का काम करता है। चलिए सुनते हैं छठ की भक्ति से सराबोर यह गीत -

5. गीत - (Maarva Re Sugva Dhanush)। छठ का यह प्रसिद्ध गीत (Chhath Puja music) गायिका अनुराधा पोडवाल गाया गया है। यह गीत भी टी-सीरीज द्वारा ही प्रोड्यूस किया गया है। चलिए सुनते हैं लोकआस्था के महापर्व का यह भक्तिमय गीत -

आखिर कब है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 15 या 16 ? जानें  श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी पर्व  की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त 

आखिर कब है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 15 या 16 ? जानें  श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी पर्व  की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
रक्षाबंधन पर्व के बाद अब लोगों पूर्णावतार माने जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी पर्व का इंतजार कर रहे  है. इस साल कब और किस शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा कान्हा का जन्मोत्सव? पूजा विधि से लेकर सभी जानकारी पाने के लिए पढ़ें ये लेख.

भगवान श्री विष्णु के अवतार माने जाने वाले योगेश्वर कृष्ण (Shri Krishna) के जन्मोत्सव का इंतजार उनके भक्तों को पूरे साल बना रहता है. भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी के दिन मनाए जाने  इस पर्व की सही तारीख को लेकर भी लोगों में हर साल की तरह इस साल भी भ्रम बना हुआ है. जिस कृष्ण के दर्शन.पूजन और नाम जपने से जीवन के सभी दु:ख दूर और मनोकामनाएं पूरी पलक झपकते पूरी हो जाती हैं, आइए उनके जन्मोत्सव की सही तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त आदि के बारे में विस्तार से जानते हैं. 


दृक पंचांग (Panchang) के अनुसार इस साल जन्माष्टमी का पर्व दो दिन मनाया जाएगा. यह पर्व पहले 15 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा. इस तरह स्मार्त परंपरा से जुड़े लोग 16 अगस्त 2025 के दिन निशीथ काल की पूजा को 00:05 से 00:47 बजे तक कर सकेंगे. इस दिन जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले लोग 16 अगस्त 2025 की रात्रि को 09:24 के बाद पारण कर सकेंगे. 

इसी प्रकार इस्कॉन (Iskcon) भारत के कम्युनिकेशंस डायरेक्टर ब्रजेंद्र नंदन दास के अनुसार इस साल वैष्णवजन और तमाम आस्थावान लोग 16 अगस्त की रात को कान्हा के जन्म का उत्सव मनाते हुए 17 अगस्त 2025 को 00:05 से 00:47 बजे के बीच पूजा कर सकेंगे.

जन्माष्टमी पर कैसे करें कान्हा की पूजा 

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए तन.मन से पवित्र होकर उनकी पूजा का सारा सामान जैसे दूध, दही, घी, शहद, तुलसी, पंचामृत, पंजीरी, शक्कर आदि अपने पास रख लें. सबसे पहले कान्हा की पूजा के लिए एक चौकी पर पीले वस्त्र बिछाएं और एक थाल में अपने बाल गोपाल को रखकर दूध, दही, घी, शहद, आदि से स्नान कराएं. इसके बाद उन्हें गंगाजल से एक बार फिर नहलाएं.

फिर कान्हा की मूर्ति को साफ कपड़े से पोंछकर उनका वस्त्र, मोर मुकुट, चंदन आदि से श्रृंगार करें. इसके बाद कान्हों को पंजीरी, पंचामृत, मिठाई, फल आदि का भोग लगाएं. कान्हा की पूजा में भोग के साथ तुलसी अवश्य चढ़ाएं. पूजा के अंत में भगवान श्री कृष्ण की पूरे भक्तिभाव के साथ आरती करें. पूजा खत्म होने के बाद अधिक से अधिक लोगों को प्रसाद बांटें और स्वयं भी ग्रहण करें. 

कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के उपाय

जन्माष्टमी के पर्व वाले दिन भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा पाने के लिए उनके भक्तों को अधिक से अधिक गाय की सेवा करनी चाहिए. साथ ही साथ जन्माष्टमी पर्व पर उनकी पूजा करते समय केसर मिश्रित दूध से उनका अभिषेक करना चाहिए. भगवान श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी दल चढ़ाने वाले भक्त पर भी भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा बरसती है. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. B.I.News/www.newsbin24.com इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

राखी बांधने का शुभ मुहूर्त केवल इतने घंटे का है, ये 2 योग इस बार राखी पर हैं बेहद खास, जन्म तारीख के अनुसार रंगों की राखी है खास
राखी बांधने का शुभ मुहूर्त केवल इतने घंटे का है, ये 2 योग इस बार राखी पर हैं बेहद खास, जन्म तारीख के अनुसार रंगों की राखी है खास

इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा काल का कोई असर नहीं होगा, जिससे 9 अगस्त को सुबह से दोपहर तक राखी बांधना शुभ रहेगा. श्रवण नक्षत्र और सौभाग्य योग का संयोग इस त्योहार को और खास बना रहा है.

इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा काल की कोई रुकावट नहीं है. लिहाजा बहनों को अपने भाईयों को राखी बांधने के लिए पूरा समय मिलेगा. (Raksha Bandhan shubh muhurat) 9 अगस्त को सूर्योदय से लेकर करीब साढ़े सात घंटे तक शुभ माना जा रहा है. इस दिन सूरज सुबह 5:47 बजे उगेगा और पूर्णिमा की तिथि दोपहर 1:25 बजे तक रहेगी. ऐसे में सुबह से दोपहर तक बहनें अपने भाइयों को राखी बांध सकती हैं. (Rakhi Bandhne Ka Shubh Samay) पंचांग के मुताबिक इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा नहीं है.  (Bhadra kaal on Raksha Bandhan 2025) यानी किसी भी तरह की रुकावट या मनाही वाला समय नहीं पड़ेगा.



खास बन रहा है योग

श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 8 अगस्त को दोपहर 2:13 बजे शुरू होगी और इसका उदयकाल 9 अगस्त को पड़ेगा. इसलिए राखी का त्योहार 9 अगस्त को ही मनाया जाएगा. ये दोनों योग 9 अगस्त को दोपहर 2:24 बजे तक रहेंगे. ज्योतिष के अनुसार ऐसा संयोग रक्षाबंधन को और भी खास बना देता है.



क्या करें क्या नहीं?

8 अगस्त की रात पूर्णिमा तिथि के दौरान व्रत रखने वाले लोग श्रीसत्यनारायण भगवान की कथा और पूजा कर सकते हैं. वहीं 9 अगस्त को स्नान-दान और पूजा-पाठ से जुड़े काम किए जाएंगे. इसी दिन श्रावण मास के नियमों का आखिरी दिन भी रहेगा. रक्षाबंधन सिर्फ भाई-बहन का पर्व नहीं है, इसके साथ कई और परंपराएं भी जुड़ी हैं. इस दिन सिर्फ बहनों को ही नहीं, बल्कि घर के बड़े बुजुर्गों या पुरोहितों से भी रक्षा-सूत्र बंधवाना चाहिए. फिर उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेना चाहिए. इससे घर में सुख-शांति और तरक्की बनी रहती है.

कौन से रंग की राखी मेरे भैया के लिए रहेगी लकी 

अगर बहनें भाई की राशि और जन्म तारीख के मुताबिक राखी का रंग चुनें तो उनके सौभाग्य में बढ़ोतरी हो सकती है. ऐसा करने से न सिर्फ भाई को फायदा होगा, बल्कि उन्हें नए मौके भी मिल सकते हैं. परंपरा के मुताबिक लाल, पीला और सुनहरे रंग की राखी बांधना अच्छा माना जाता है. लेकिन इसके साथ ही ज्योतिष के अनुसार जन्म तारीख के हिसाब से भी राखी का रंग तय किया जा सकता है.



जन्म तारीख के मुताबिक राखी का सही रंग:

1, 10, 19, 28 – लाल, गुलाबी, नारंगी

2, 11, 29 – चमकीला सफेद और क्रीम

3, 12, 21, 30 – पीला या सुनहरा पीला

4, 13, 22, 31 – चमकीला और चटकीला रंग

5, 14, 23 – चमकीला सफेद और सफेद

7, 16, 25 – चमकीला और मिश्रित रंग

8, 17, 26 – नीला और भूरा रंग

9, 18, 27 – लाल, गुलाबी, नारंगी

अगर आप भी इस बार राखी पर अपने भाई की तरक्की और खुशहाली की दुआ मांग रही हैं तो इन रंगों का ध्यान जरूर रखें. सही रंग से बांधी गई राखी रिश्ते को और भी खास बना सकती है.

कब है रक्षाबंधन जानिए भाई की कलाई पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
कब है रक्षाबंधन जानिए भाई की कलाई पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

भाई-बहन के प्यार का पर्व है रक्षा बंधन. इस साल रक्षाबंधन के दिन भद्रा का साया लगेगा या नहीं और किस मुहूर्त में बांधी जाएगी राखी, जानिए यहां. 

 हिंदू धर्म में रक्षाबंधन का अत्यधिक महत्व होता है. बहन और भाई के प्रेम को समर्पित है यह पर्व. मान्यतानुसार इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा का सूत्र यानी राखी (Rakhi) बांधती हैं और उसकी लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करती हैं. वहीं, भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देता है. भाई-बहन यूं तो हमेशा झगड़ते रहते हैं लेकिन एकदूसरे के बिना रह भी नहीं सकते हैं. इस दिन की अत्यधिक धार्मिक मान्यता है और पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वंय देवी-देवता भी रक्षाबंधन मनाते हैं. ऐसे में जानिए भाई-बहन के स्नेह के प्रतीक रक्षाबंधन को इस साल किस दिन मनाया जाएगा, रक्षाबंधन के दिन भद्रा का साया होगा या नहीं और किस शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurt) में बहनें भाईयों की कलाई पर राखी बांध सकती हैं. 

कब है रक्षाबंधन | Raksha Bandhan 2025  Date | Kab Hai Raksha Bandhan 

पंचांग के अनुसार, श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर रक्षाबंधन मनाया जाता है. इस साल पूर्णिमा तिथि 8 अगस्त की दोपहर 2 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 1 बजकर 21 मिनट पर समाप्त हो जाएगी. रक्षाबंधन उदया तिथि को ध्यान में रखकर मनाया जाता है और इसीलिए इस साल रक्षाबंधन की सही तारीख 9 अगस्त, शनिवार है. इसी दिन बहनें भाईयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांध सकेंगी. 

रक्षाबंधन पर भद्रा लगेगी या नहीं 

माना जाता है कि जिस समय भद्रा लगती है उस समय भाई की कलाई पर राखी बांधना शुभ नहीं होता है. ऐसे में भद्रा का साया रक्षाबंधन पर है या नहीं यह हर साल ही बड़ा सवाल रहता है. हालांकि, इस साल रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं होगा. भद्रा काल (Bhadra Kaal) 8 अगस्त की दोपहर 2 बजकर 12 मिनट से 9 अगस्त की सुबह 1 बजकर 52 मिनट तक रहने वाला है. रक्षाबंधन 9 अगस्त के दिन मनाया जा रहा है इसीलिए रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं होगा और बिना चिंता किए भाई को बहनें राखी बांध सकती हैं. 

राखी बांधने का शुभ मुहूर्त 

रक्षा बंधन के दिन बहुत सी बहनें व्रत भी रखती हैं. जबतक वे कुछ खा नहीं लेतीं तबतक भाई की कलाई पर राखी नहीं बांधती हैं. राखी शुभ मुहूर्त देखकर बांधी जाती है. इस साल 9 अगस्त की सुबह 5:35 से दोपहर 1:24 तक रक्षाबंधन का शुभ मुहूर्त है. इस मुहूर्त में राखी बांधना अत्यधिक शुभ होगा. इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:00 बजे से 12:53 मिनट के बीच बन रहा है. इस समयावधि में राखी बांधना और अधिक शुभ रहेगा. 

राखी कब हटाते हैं 

मान्यतानुसार रक्षाबंधन पर बांधी गई राखी को 24 घंटों के बाद उतारा जा सकता है. जन्माष्टमी के दिन भी कलाई से राखी हटाई जा सकती है. बहुत से भाई राखी को तबतक बांधकर रखते हैं जबतक कि वह कलाई से खुद उतर नहीं जाती है. 

अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ से परामर्श करें. B.I.News (www.newsbin24.com) इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.

जानिए आचार्य जी से वट वृक्ष के बिना कैसे करें वट सावित्री की पूजा?
जानिए आचार्य जी से वट वृक्ष के बिना कैसे करें वट सावित्री की पूजा?

कई बार ऐसा होता है कि आप जिस जगह पर रह रही हैं उसके आस-पास कहीं बरगद का पेड़ नहीं है तो ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिए, इसी के बारे में आचार्य दिनेश नारायण पाण्डेय बता रहे हैं...

वट सावित्री व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है. यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है. क्योंकि यह व्रत पति की लंबी आयु और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखा जाता है. इस दिन पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा की जाती है. मान्यता है सावित्री को अपने पति सत्यवान के प्राण वट वृक्ष के नीचे ही मिला था. यही कारण है इस पूजा में बरगद के पेड़ का विशेष महत्व है. वहीं धार्मिक मान्यता अनुसार वट वृक्ष में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु, महेश का वास होता है. लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आप जिस जगह पर रह रही हैं उसके आस-पास कहीं बरगद का पेड़ नहीं है तो ऐसी स्थिति में आपको क्या करना चाहिए, इसी के बारे में आचार्य दिनेश नारायण पाण्डेय बता रहे हैं...








बरगद का वृक्ष न हो तो कैसे करें वट सावित्री की पूजा

  • अगर आस-पास बरगद का पेड़ नहीं है तो फिर आप एक दिन पहले कहीं वट वृक्ष ढूंढ लीजिए और उसके नीचे से मिट्टी घर लेकर आएं. अब उस मिट्टी पर सावित्री और सत्यवान तथा भैंसे पर सवार यमराज की प्रतिमा स्थापित कर पूजा कर सकती हैं. 
  • इसके अलावा आप वट वृक्ष की डाली भी लेकर आ सकती हैं जिसमें फल लगे हों.अब इस डाली को किसी गमले में लगा दीजिए और व्रत वाले दिन वट वृक्ष मानकर विधि-विधान के साथ पूजा करें.
  • अगर आपको जहां पर आप रहती हैं वहां पर कहीं भी बरगद का पेड़ नहीं मिला तो फिर आप तुलसी के पौधे के पास बैठकर विधि-विधान के साथ पूजा कर सकती हैं. 

वट सावित्री व्रत कथा - Vat Savitri Vrat katha

मद्र देश के राजा अश्वपति के पुत्री रूप में सर्वगुण संपन्न सावित्री का जन्म हुआ. राजकन्या ने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान की कीर्ति सुनकर उन्हें पति रूप में वरण कर लिया. यह बात जब त्रऋषिराज नारद को पता चली तो वे अश्वपति से जाकर कहने लगे आपकी कन्या ने वर खोजने में निःसन्देह भारी भूल की है. सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा भी है, परन्तु वह अल्पायु है और एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जायेगी.

नारद की यह बात सुनते ही राजा अश्वपति का चेहरा उदास हो गया. उन्होंने अपनी पुत्री को समझाया कि ऐसे अल्प आयु व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित नहीं. इसलिए कोई अन्य वर चुन लो, इस पर सावित्री बोली-पिताजी ! आर्य कन्याएं अपना पति एक बार ही वरण करती हैं. अब चाहे जो भी हो मैं सत्यवान को ही वर स्वरूप स्वीकार करूंगी. सावित्री ने नारद से सत्यवान की मृत्यु का समय मालूम कर लिया था. अन्ततः उन दोनों का विवाह हो गया. वह ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा में रात-दिन रहने लगी. समय बदला, ससुर का बल क्षीण होता देख शत्रुओं ने राज्य छीन लिया.

नारद का वचन सावित्री को दिन प्रतिदिन अधीर करता रहा. उसने पति के मृत्यु का दिन नजदीक आने से तीन दिन पूर्व से ही उपवास शुरू कर दिया. नारद् द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया. नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकड़ी काटने के लिए जब चला तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा लेकर चलने को तैयार हो गई.

सत्यवान वन में पहुंचकर लकड़ी काटने के लिए वृक्ष पर चढ़ा. वृक्ष पर चढ़ने के बाद उसके सिर पर भयंकर पीड़ा होने लगी. वह नीचे उतरा. सावित्री ने उसे बड़ के पेड़ के नीचे लिटाकर उसका सिर अपनी जाघ पर रख लिया. देखते ही देखते यमराज सत्यवान के प्राणों को लेकर चल दिये (कहीं-कहीं ऐसा भी उल्लेख मिलता है कि वट वृक्ष के नीचे लेटे हुए सत्यवान को सर्प ने डस लिया था) सावित्री सत्यवान को वट वृक्ष के नीचे ही लिटाकर यमराज के पीछे-पीछे चल दी. पीछे आती हुई सावित्री को यमराज ने उसे लौट जाने का आदेश दिया. इस पर वह बोली महाराज जहां पति वहीं पत्नी. यही धर्म है, यही मर्यादा है.

सावित्री की धर्म निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज बोले पति के प्राणों के अतिरिक्त कुछ भी मांग लो. सावित्री ने यमराज से सास-श्वसुर के आंखों की ज्योति और दीर्घायु मांगी. यमराज तथास्तु कहकर आगे बढ़ गए. सावित्री अभी भी यमराज का पीछा करती रही. यमराज ने अपने पीछे आती सावित्री से वापस लौट जाने को कहा तो सावित्री बोली पति के बिना नारी के जीवन की कोई सार्थकता नहीं. यमराज ने सावित्री के पति व्रत धर्म से खुश होकर पुनः वरदान मांगने के लिए कहा. इस बार उसने अपने ससुर का राज्य वापस दिलाने की प्रार्थना की. तथास्तु कहकर यमराज आगे चल दिये. सावित्री अब भी यमराज के पीछे चलती रही. इस बार सावित्री ने यमराज से सौ पुत्रों की मां बनने का वरदान मांगा. तथास्तु कहकर जब यमराज आगे बढ़े तो सावित्री बोली आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर पति के बिना मैं मां कैसे बन सकती हूं. अपना यह तीसरा वरदान पूरा कीजिए.

सावित्री की धर्मनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को अपने पास से स्वतंत्र कर दिया. सावित्री सत्यवान के प्राण को लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची जहां सत्यवान का मृत शरीर रखा था. सावित्री ने वट वृक्ष की परिक्रमा की तो सत्यवान जीवित हो उठा.

प्रसन्नचित्त सावित्री अपने सास-श्वसुर के पास पहुंची तो उन्हें नेत्र ज्योति प्राप्त हो गई. इसके बाद उनका खोया हुआ राज्य भी उन्हें मिल गया. तभी से वट वृक्ष की पूजा की जाती है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. B.I.News (www.newsbin24.com) इसकी पुष्टि नहीं करता है.) 


2 दिन रखा जाएगा निर्जला एकादशी का व्रत, 32 घंटे लंबा होगा उपवास, जानिए तिथि, मुहूर्त और महत्व
2 दिन रखा जाएगा निर्जला एकादशी का व्रत, 32 घंटे लंबा होगा उपवास, जानिए तिथि, मुहूर्त और महत्व

साल भर में आने वाली एकादशी में निर्जला एकादशी भी बहुत महत्वपूर्ण होती है. इस बार की निर्जला एकादशी बहुत खास मानी जा रही है. जानिए सही तिथि और मुहूर्त.

निर्जला एकादशी के दिन इस मंत्र का जाप करना बहुत शुभ माना जाता है। 

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

निर्जला एकादशी हिंदू धर्म में विशेष स्थान रखती है. इसे साल की सबसे कठिन और पुण्यदायी एकादशी (Nirjala Ekadashi Ka Vrat Kab Hai) भी माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस एकादशी को करने से व्यक्ति को वर्ष भर की 24 एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है. इस वर्ष 2025 में, निर्जला एकादशी का व्रत दो दिन मनाया जाएगा. पहले दिन स्मार्त निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi Kitne Prakar Ki Hoti Hai) का व्रत होगा और दूसरे दिन वैष्णव निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाएगा. चलिए जानते हैं इस व्रत की तिथि, विधि और जरूरी नियम.

निर्जला एकादशी 2025 की तिथि और समय

दृक पंचांग के अनुसार, निर्जला एकादशी की तिथि 6 जून 2025 को सुबह 2:15 बजे से शुरू होकर 7 जून 2025 को सुबह 4:47 बजे समाप्त होगी. हरि वासर का समापन 7 जून को सुबह 11:25 बजे होगा.
•    स्मार्त निर्जला एकादशी व्रत: 6 जून 2025, शुक्रवार
•    वैष्णव निर्जला एकादशी व्रत: 7 जून 2025, शनिवार
इस दिन व्रत करने वाले गृहस्थों के लिए यह व्रत 32 घंटे 21 मिनट तक रहेगा. व्रत सूर्योदय से शुरू होगा और पारण के समय तक चल सकता है.

निर्जला एकादशी व्रत के नियम और विधि

निर्जला एकादशी का व्रत कठिन माना जाता है क्योंकि इसमें जल और भोजन का पूरी तरह त्याग किया जाता है. इस दिन व्रती को भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और व्रत का पालन संयम और नियम से करना चाहिए.
क्या करें:
•    सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पवित्र वस्त्र धारण करें.
•    भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें.
•    पूरे दिन बिना जल और अन्न के रहें.
•    हरि नाम का जाप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें.
•    जरूरतमंदों को दान करें और ब्राह्मण भोजन कराएं.

स्मार्त और वैष्णव निर्जला एकादशी में अंतर

जब एकादशी व्रत दो दिन होता है, तब पहले दिन स्मार्त व्रत और दूसरे दिन वैष्णव व्रत करने की मान्यता है.
•    स्मार्त व्रत: इसे सामान्य गृहस्थ और अनुयायी करते हैं.
•    वैष्णव व्रत: इसे वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी पालन करते हैं.
गृहस्थ भी वैष्णव व्रत रख सकते हैं, लेकिन उन्हें वैष्णव संप्रदाय के नियमों का पालन करना होगा.

निर्जला एकादशी व्रत का पारण समय 2025

निर्जला एकादशी व्रत के पारण का समय हरि वासर के समापन के बाद माना जाता है.
•    स्मार्त व्रत पारण: 7 जून 2025, दोपहर 1:44 बजे से 4:31 बजे तक
•    वैष्णव व्रत पारण: 8 जून 2025, सुबह 5:23 बजे से 7:17 बजे तक

निर्जला एकादशी व्रत का महत्व

निर्जला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट होते हैं. माना जाता है कि भीमसेन ने इस व्रत का पालन किया था, क्योंकि वो अन्य एकादशियों का पालन नहीं कर पाते थे. इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है.
इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को मृत्यु के बाद विष्णु लोक की प्राप्ति होती है. इसके अलावा, यह व्रत मानसिक और शारीरिक शुद्धि के लिए भी लाभकारी माना गया है.

निर्जला एकादशी व्रत के लाभ

1.    सभी एकादशियों का पुण्य: इस एकादशी के व्रत से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के समान पुण्य फल प्राप्त होता है.
2.    पापों का नाश: इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं.
3.    मोक्ष की प्राप्ति: निर्जला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को विष्णु लोक में स्थान मिलता है.
4.    शारीरिक और मानसिक शुद्धि: यह व्रत मन को शुद्ध करने और संयम रखने की प्रेरणा देता है.
5.    दान का महत्व: इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और जल का दान करने से भी पुण्य लाभ मिलता है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. B.I.News (www.newsbin24.com) इसकी पुष्टि नहीं करता है.) 

 

नवरात्रि के बाद कलश, नारियल, पूजन और हवन सामग्री का क्या करें? जानें नियम और सावधानियां

नवरात्रि के बाद कलश, नारियल, पूजन और हवन सामग्री का क्या करें? जानें नियम और सावधानियां

Navratri Ke Bad ke Niyam : चैत्र नवरात्रि के समापन पर पूजन सामग्री का सही निपटान महत्वपूर्ण है. सामग्री को नदी में न डालें, नवरात्रि के बाद पूजा और हवन आदि सामग्री का क्या करना चाहिए? इसके बारे में आइए जानते हैं विस्तार से.

  • पूजन सामग्री नदी में न डालें, निर्जन स्थान पर गाड़ें.
  • कलश का नारियल प्रसाद रूप में ग्रहण करें या धन स्थान में रखें.
  • कलश का जल घर के कोनों में छिड़कें, बचे जल को पेड़ में डालें.

Navratri Ke Bad ke Niyam : रामनवमी के पर्व के साथ चैत्र नवरात्रि का समापन हो चुका है. नवरात्रि के व्रत का पारण दसवीं की तिथि में किया जाता है. नवरात्रि के दौरान 9 दिन तक घरों में चौकी सजाई जाती है. जिस पर कलश,नारियल, गंगाजल,देवी की प्रतिमा सहित पान, सुपारी, पुष्प, भोग आदि अर्पित किया जाता है. व्रत के अंतिम दिन हवन करके कन्या पूजन आदि किया जाता है. इसके बाद नवरात्रि का व्रत पूर्ण माना जाता है.

पूजन सामग्री का क्या करें : नवरात्रि समाप्ति होने के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि नवरात्रि में प्रयोग की गई पूजन सामग्री और हवन के बाद बची हुई राख आदि सामग्री का क्या किया जाए. बहुत से लोग इसे गंगाजल अथवा पवित्र नदी में प्रवाहित करते हैं. तो कुछ घरों में यह सामग्री काफी समय तक रखी रहती है.

नदी में विसर्जन न करें : नवरात्रि में प्रयोग की गई पूजन हवन सामग्री आदि चीजों का विसर्जन पवित्र नदियों में किया जाता था. अब समय के साथ धीरे-धीरे प्रदूषण इस कदर बढ़ गया है की नदियां पहले से ही दूषित होती जा रही है. ऐसे में पवित्र नदियों में इस सामग्री को डालकर और दूषित न करें.

सामग्री कहां डालें : पूजन, हवन की सामग्री,नारियल आदि सभी चीजों को किसी वस्त्र में एकत्र करके उसे घर के दूर कहीं निर्जन स्थान पर जमीन पर गड्ढा खोदकर गाढ़ देना चाहिए.

कलश के नारियल का क्या करें : नवरात्रि के पश्चात जब कलश पर से नारियल उठाया जाएगा तो उसे नारियल को या तो परिवार के सभी सदस्यों में बताकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करें अथवा उसे लाल कपड़े में लपेटकर अपने धन स्थान में रख दें. इससे घर में धन की समस्या समाप्त होगी.

कलश के जल का प्रयोग : नवरात्रि के पहले दिन जी कलश की स्थापना की गई उसे कलश के जल को अपने घर के हर कोने में छत और मुख्य द्वार पर छिड़कें और बचे हुए जल को तुलसी अथवा पीपल बरगद आदि की जड़ में डाल दें ध्यान रहे इस जल को बाथरूम और शौचालय में ना डालें.

सुपाड़ी, चावल और सिक्के का प्रयोग : कलश स्थापना के दौरान सुपारी चावल और एक सिक्के को भी रखा जाता है. नवरात्रि के पश्चात सिक्के को आप अपने पर्स में रख सकते हैं और सुपारी एवं चावल को अपनी तिजोरी में रखना चाहिए.

 

इस बार चैत्र नवरात्रि 8 दिन, इस ज्योतिषीय वजह को जानते हैं आचार्य दिनेश नारायण पाण्डेय से

इस बार चैत्र नवरात्रि 8 दिन, इस ज्योतिषीय वजह को जानते हैं आचार्य दिनेश नारायण पाण्डेय से

इस बार नवरात्रि 9 नहीं बल्कि 8 दिन की होगीण् इसके पीछे की क्या वजह हैए इसी के बारे में आज हम आपको आगे आर्टिकल में बता रहे हैं.

Chaitra Navratri 2025 : इस साल चैत्र नवरात्रि 30 मार्च से शुरू हो रही है. इस दौरान मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की जाएगी. इस दौरान सच्चे मन से मां दुर्गा की आराधना करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मां का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है. नवरात्रि का आठवां और नौवां दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है. इन दोनों तिथियों में कन्या पूजन किया जाता है. लेकिन इस बार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ रही है. यानी इस बार नवरात्रि 9 नहीं बल्कि 8 दिन की होगी. इसके पीछे की क्या वजह है, इसी के बारे में आज हम आपको आगे आर्टिकल में बता रहे हैं.

चैत्र नवरात्रि 8 दिन की क्यों - Why is Chaitra Navratri of 8 days?

आपको बता दें कि इस बार तृतीया तिथि का क्षय हो रहा है. जिसके कारण अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग एक साथ बन रहा है. इस प्रकार 5 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि का पूजन किया जाएगा और इस दिन ही कन्या पूजन भी होगा.

चैत्घर नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त 2025 - Kalash sthapna muhurat 2025

आपको बता दें कि नवरात्रि का पर्व घटस्थापना के साथ शुरू होता है. 30 मार्च को कलश स्थापना मुहूर्त सुबह 6 बजकर 13 मिनट से सुबह 10 बजकर 22 मिनट तक है फिर अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 1 मिनट से 12 बजकर 50 मिनट तक है. 

चैत्र नवरात्रि अष्टमी मंत्र - Ashtami mantra's

अष्टमी मंत्र

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।। 

या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

बीज मंत्र

श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।

पूजन मंत्र

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचि:। 
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा।।

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। 

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।







चैत्र नवरात्रि नियम - Rules related to Chaitra Navratri fast

  • नवरात्रि के समय तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए.
  • शराब, तंबाकू और मांसाहारी चीजें घर में नहीं लाएं.
  • नाखून, बाल और दाढ़ी काटने से बचें.
  • 9 दिन तक खाने में सरसों और तिल का सेवन नहीं करें. 
  • व्रत के दौरान सेंधा नमक का सेवन करें. 
  • चमड़े से बनी चीजों का इस्तेमाल नहीं करें. 
  • नवरात्रि के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनें.
  • किसी से झूठ और अपशब्द न बोलें. 
  • नवरात्रि के समय घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें. 
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य ,राय ,पूजन का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने  पुरोहित से परामर्श करें. B.I.News (www.newsbin24.com) इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)


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