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पितृपक्ष में भूलकर भी न करें ये 7 काम, नाराज हो सकते हैं पितर?

पितृपक्ष में भूलकर भी न करें ये 7 काम, नाराज हो सकते हैं पितर?
पितृपक्ष में पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व माना जाता है. आचार्य मदनमोहन ने बताया कि इन दिनों शुभ काम, मांस-मदिरा, कलह, अपशब्द और असहायों को परेशान करने से बचना चाहिए. जानें पितृपक्ष के 7 जरूरी नियम.


हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का समय माना जाता है. इस दौरान लोग अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दिनों घर के वातावरण को शांत और सात्विक रखना चाहिए. आचार्य मदनमोहन ने बताया कि पितृपक्ष में कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें करने से बचने की सलाह दी जाती है. आइए जानते हैं वे कौन-से 7 काम हैं.







शुभ काम करने से बचें

आचार्य मदनमोहन ने बताया कि पितृपक्ष को पूर्वजों को समर्पित समय माना जाता है. इसलिए इस दौरान शादी, सगाई, गृह प्रवेश या नया कारोबार शुरू करने जैसे शुभ कामों को टालने की धार्मिक मान्यता है. इसी तरह नई गाड़ी, प्रॉपर्टी या कोई बड़ी खरीदारी करने से भी बचने की सलाह दी जाती है. साथ ही पितृपक्ष में सादगी और मनन-चिंतन का भाव रखने की परंपरा है. इसलिए इस दौरान नए कपड़े खरीदने या पहनने से बचने की सलाह दी जाती है. हालांकि, दान करने के लिए वस्त्र खरीदे जा सकते हैं.

मांस-मदिरा से रखें दूरी

आचार्य के मुताबिक, पितृपक्ष में सात्विक भोजन करने की परंपरा है। इसलिए मांस और मदिरा जैसे तामसिक माने जाने वाले पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी जाती है. इन दिनों घर का माहौल शांत रखने पर जोर दिया जाता है. परिवार के सदस्यों को आपसी विवााद, गुस्सा और झगड़े से बचना चाहिए. धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष में सकारात्मक और शांत वातावरण रखनाा शुभ माना जाता है.

असहाय और पशु-पक्षियों को न सताएं

आचार्य मदनमोहन के अनुसार, इस दौरान किसी असहाय व्यक्ति को परेशान नहीं करना चाहिए. पशु-पक्षियों के प्रति भी दया और करुणा का व्यवहार रखने की सलााह दी जाती है. साथ ही पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व माना गया है. परिवार की परंपरा के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध करनाा इस अवधि का प्रमुख धार्मिक कर्म है.

अपशब्द और झूठ बोलने से बचें

पितृपक्ष में वाणी और व्यवहार को संयमित रखने की सलाह दी जाती है. किसी को अपशब्द कहना, झूठ बोलना या जानबूझकर किसी को दुख पहुंचााना धार्मिक रूप से उचित नहीं मानाा जाता है.

हनुमान अंश की 38वें दिन कमाई से दुनिया भर में डंका, हैवान को ढेर कर मिला बनाया रिकॉर्ड

Hanuman Ansh worldwide Box Office Collection: संडे को 'हनुमान अंश' एक बार फिर दर्शकों की पहली पसंद बनी. जबकि अक्षय कुमार की 110 करोड़ी फिल्म हैवान फ्लॉप साबित हुई नजर आई. 

हनुमान अंश की 38वें दिन कमाई से दुनिया भर में डंका, हैवान को ढेर कर मिला बनाया रिकॉर्ड


नई दिल्ली:

Hanuman Ansh worldwide Box Office Collection: नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म हनुमान अंश पर हनुमान जी का आशीर्वाद बढ़ता जा रहा है. तभी तो संडे को नई बॉलीवुड फिल्मों की बजाय दर्शक  'हनुमान अंश' को देखना पसंद कर रहे हैं. इसी का असर है कि 2 करोड़ में बजट में बनीं फिल्म ने दुनियाभर में 38वें दिन 22 करोड़ से ज्यादा की कमाई है. जबकि अक्षय कुमार और सैफ अली खान की 110 करोड़ के बजट में बनीं फिल्म हैवान पहले वीकेंड पर फ्लॉप होती नजर आई. वहीं अब नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म ने 38 दिनों में 250 करोड़ का आंकड़ा बॉक्स ऑफिस पर हासिल कर लिया है. आइए आपको बताते हैं हनुमान अंश की 38 दिनों की कमाई. 

हनुमान अंश का 38 दिनों का कलेक्शन  बॉक्स ऑफिस ट्रैकर सैकनिल्क के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, 38वें दिन संडे को हनुमान अंश ने 8,902 शोज के साथ 22.50 करोड़ की कमाई हासिल की है, जिसके बाद इंडिया नेट कलेक्शन 214.63 करोड़ और ग्रॉस कलेक्शन 253.55 करोड़ हुआ है. वहीं ओवरसीज फिल्म ने 38वें दिन 5 करोड़ की कमाई की, जिसके बाद ओवरसीज कलेक्शन 14.50 करोड़ रहा है. इसके साथ वर्ल्डवाइड कलेक्शन 268.05 करोड़ पहुंच गया है. 

हैवान को किया हनुमान अंश ने ढेर हनुमान अंश के आगे अक्षय और सैफ की हैवान ढेर हो गई है. पहले दिन जहां फिल्म ने 3 करोड़ का कलेक्शन किया था तो वहीं दूसरे दिन 2.5 करोड़ फिल्म ने कमाए. जबकि तीसरे दिन कलेक्शन दो दिनों के मुकाबले 1.85 करोड़ ही हुआ. इसके साथ ही फ्लॉप वीकेंड की कमाई के साथ भारत में नेट कलेकशन 7.35 करोड़, इंडिया ग्रॉस 8.80 करोड़ और वर्ल्डवाइड 11.55 करोड़ ही फिल्म ने कमाए हैं. जबकि फिल्म का बजट 110 से 125 करोड़ का बताया गया है. 



हनुमान अंश की प्रोड्यूसर ने कही ये बात अनुप्रिया नागर ने अपने सफर को याद करते हुए कहा, ''मैं यूके में पढ़ रही थी, इकोनॉमिक्स कर रही थी. मेरी यूके में जॉब लग गई थी और मेरा भारत वापस आने का कोई प्लान नहीं था. फाइनल ईयर में जब मैं रिसर्च कर रही थी, तब मैंने देखा कि नीम करौली बाबा ने एप्पल के फाउंडर स्टीव जॉब्स को प्रभावित किया. इसके साथ दूसरे विदेशी लोगों को भी प्रभावित किया. ऐसे में मेरे दिमाग में एक सवाल आया कि मैं भारतीय हूं लेकिन नीम करौली बाबा के बारे में मुझे विदेशियों से क्यों पता चला. उस समय मैं जेन जी के नजरिए से इस कहानी को लोगों तक पहुंचाने के अलग-अलग तरीके सोचने लगी थीं. मेरे मन में किताब लिखने और कॉमिक बुक बनाने जैसे विचार आए. हालांकि जब मैं किसी काम से भारत वापस आई और मेरी मुलाकात प्रोड्यूसर रागिनी सोना से हुई. रागिनी ने मुझे बताया कि वह 'हनुमान अंश' नामक फिल्म बना रही हैं और फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है. ये जानकर मेरी जिज्ञासा बढ़ गई और मैंने फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ने की इच्छा जताई.''

120 पेज की स्क्रिप्ट एक बार में पढ़ी  अनुप्रिया ने कहा, ''मैंने फिल्म की करीब 120 पेज की स्क्रिप्ट एक ही बार में पढ़ डाली. स्क्रिप्ट पढ़ते हुए मेरा कनेक्शन कहानी से इतना गहरा हो गया कि कई जगह मैं इमोशनल हुईं और कई जगह मेरे रोंगटे खड़े हो गए। इसी अनुभव ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर सिर्फ स्क्रिप्ट पढ़कर मैं इतना महसूस कर रही हूं, तो पर्दे पर पूरी फिल्म देखने के बाद दर्शकों पर इसका कितना असर होगा. फिल्म से जुड़ने के बाद इसकी सफलता की ऐसी उम्मीद मैंने नहीं की थी. फिल्म जिस तरह से कमाई कर रही है, वह हमारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा है. मैं इस सफलता को सिर्फ बॉक्स ऑफिस नंबर नहीं बल्कि लोगों के फिल्म से जुड़ने के रूप में देखती हूं.''

जब नीम करोली बाबा ने मांगी अरहर की दाल, साधारण रोटी कैसे बन गई अलौकिक प्रसाद, जानिए...

Neem Karoli Baba Story: नीम करोली बाबा से जुड़ी एक भक्त-कथा में एक अनजान बांसुरी वाले ने अरहर की दाल मांगी. उसी समय पुरी में महाराज जी भी अरहर की दाल खाने की इच्छा जता रहे थे.

जब नीम करोली बाबा ने मांगी अरहर की दाल, साधारण रोटी कैसे बन गई अलौकिक प्रसाद, जानिए...

नीम करौली बाबा यानी महाराजजी से जुड़ी कई ऐसी भक्त-कथाएं हैं, जिन्हें सुनकर श्रद्धालु आज भी हैरान रह जाते हैं. ऐसी ही एक कथा में अरहर की दाल और रोटी का जिक्र आता है. बता दें कि एक अनजान व्यक्ति बांसुरी लेकर एक घर पहुंचा और उसने भूख लगने की बात कहते हुए अरहर की दाल मांगी. हैरानी की बात यह रही कि उसी समय पुरी में मौजूद महाराजजी ने भी अचानक अरहर की दाल और रोटी खाने की इच्छा जताई. भक्तों ने इस घटना को बाबा की आध्यात्मिक लीला और दर्शन से जोड़कर देखा.

अचानक घर पहुंचा बांसुरी वाला शख्स

दादा मुकर्जी ने अपनी पुस्तक By His Grace: A Devotee's Story में इस बात का जिक्र करते हुए लिखा कि एक दिन महाराजजी जगन्नाथ पुरी गए हुए थे और वह इलाहाबाद स्थित अपने घर पर थे. करीब शाम चार बजे घर के पीछे से बच्चों के शोर की आवाज आई. बच्चे एक लंबे बालों वाले व्यक्ति के आसपास जमा थे. उसके हाथ में पीतल की बांसुरी थी. उस व्यक्ति ने भूख लगने की बात कही. घर से उसे रोटी और दाल दी गई, लेकिन उसने खास तौर पर अरहर की दाल का नाम लिया और कहा कि उसने काफी समय से अरहर की दाल नहीं खाई है.

प्रसाद खाने के बाद कही रहस्यमयी बात  घरवालों ने उसे खाना और वृंदावन से आया प्रसाद भी दिया. खाना खत्म करने के बाद जब उसे मुंह धोने के लिए कहा गया तो उसने मुंह धोने के बजाय अपनी बांसुरी ही धो दी. जाते समय उस व्यक्ति ने कहा कि वह काफी समय से ऐसे घर की तलाश में था, जहां भक्ति और लक्ष्मी का वास हो. इस बात ने घरवालों को और भी हैरान कर दिया.

बिहारी जी ने दिए दर्शन- बाबा

दादा मुकर्जी के अनुसार, इस घटना के दो दिन बाद महाराजजी घर लौटे. तब उन्होंने कहा कि बिहारी जी ने तुम्हें दर्शन दिए. यहां बिहारी जी से भगवान कृष्ण का संदर्भ माना गया है. परिवार की एक सदस्य अशोका ने यह भी बताया कि उसने दिल्ली में महाराजजी के सााथ एक व्यक्ति को देखा था, जो इसी तरह का दिखाई देताा था. हालांकि उस समय उसके हाथ में बांसुरी की जगह एक बड़ी छड़ी थी.



उसी समय पुरी में बाबा ने मांगी अरहर की दाल

जानकारी के अनुसार, इस कथा का सबसे हैरान करने वाला हिस्सा इसके बाद सामने आया. जब इस घटना की चर्चा हुई तो जीवंतिमा ने दादा मुकर्जी से पूछा कि बांसुरी वाला व्यक्ति किस दिन घर आया था. जवाब मिला- गुरुवार. जीवंतिमा ने बताया कि उसी दिन जगन्नाथ पुरी में करीब शाम चार बजे महाराजजी ने अचानक कहा कि उन्हें रोटी और अरहर की दाल खानी है. जबकि वह सामान्य तौर पर मूंग की दाल खाते थे और उस दिन भोजन भी कर चुके थे. भक्तों ने उन्हें समझाया कि उन्होंने खानाा खा लिया है, लेकिन महाराजजी बार-बार कहते रहे कि उन्हें भूख लगी है और अरहर की दाल चाहिए. आखिरकार उनके लिए अरहर की दाल बनाई गई.

भक्तों ने इसे बाबा की लीला माना 
इलाहाबाद में बांसुरी वाले व्यक्ति का अरहर की दाल मांगना और लगभग उसी समय पुरी में महाराजजी का अरहर की दाल खाने की इच्छा जताना भक्तों के लिए बेहद खास अनुभव बन गया. दादा मुकर्जी ने इसे अपनी पुस्तक में भक्त-अनुभव के रूप में दर्ज किया है. नीम करौली बाबा के भक्त इस घटना को उनकी आध्यात्मिक शक्ति और लीला से जोड़कर देखते हैं. हालांकि ऐसी घटनाओं को आस्थाा और भक्तों के अनुभव के नजरिए से समझना उचित है. 

बाबा जी के चमत्कार
बुलेट प्रूफ कंबल: एक कथा के अनुसार, बाबा जी ने एक बुजुर्ग दंपति को खाली कंबल दिया और उसे गंगा जी में प्रवाहित करने को कहा। उसी रात बर्मा फ्रंट पर युद्ध लड़ रहा उनका बेटा भारी गोलीबारी के बीच सुरक्षित बच गया। इसे बाबा रामदास ने अपनी पुस्तक 'मिरेकल ऑफ लव' में चमत्कार बताया है।

चलती ट्रेन का रुकना: कहा जाता है कि एक बार ट्रेन में टिकट न होने के कारण टीटीई ने बाबा जी को नीम करौली स्टेशन पर उतार दिया था। बाबा जी के नीचे बैठते ही ट्रेन का इंजन काम करना बंद कर गया और तमाम कोशिशों के बाद भी जब ट्रेन नहीं चली, तब अधिकारियों के अनुरोध पर बाबा जी को वापस ट्रेन में बैठाया गया, जिसके बाद ट्रेन चल पड़ी।

प्रेमानन्द जी ने बताया जन्माष्टमी पर इन 2 भोग से खुश हो जाते हैं लड्डू गोपाल, नोट कर लें रेसिपी

जन्माष्टमी पर अगर आप लड्डू गोपाल को खुश करना चाहते हैं, तो उन्हें प्रेमानन्द की ओर से बताए गए स्पेशल डिश का भोग लगाएं. यहां जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण की पसंदीदा भोग की रेसिपी-

प्रेमानन्द जी ने बताया जन्माष्टमी पर इन 2 भोग से खुश हो जाते हैं लड्डू गोपाल, नोट कर लें रेसिपी


Janmasthami Special Recipe : जन्माष्टमी का त्योहार आते ही भक्तों के मन में सबसे पहला सवाल ये आता है कि इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण को कौन-सा भोग लगाएं, ऐसा कौन सा भोग बनाएं, जिससे वे सबसे ज्यादा पसंद हो जाएंगे. अगर आप भी इस सोच में डूबे हैं, तो आपकी इस परेशानी का समाधान आपको यहां मिलेगा. अगर आप लड्डू गोपाल को उनका प्रिय भोग अर्पित करना चाहते हैं, तो प्रेमानंद महाराज की बताई दो चीजें जरूर बनाएं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रेमानंद महाराज ने कहा है कि भगवान श्रीकृष्ण को सफेद माखन और चावल के आटे का मालपुआ बहुत ही ज्यादा प्रिय है. अगर आप जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को खुश करना चाहते हैं, तो इन दो चीजों को भोग जरूर लगाएं. यहां जानते हैं रेसिपी







 

आखिर क्यों खाल है माखन और मालपुआ?

धार्मिक मान्यताएं हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप माखन बहुत ही ज्यादा प्रिय है. उन्हें बचपन से ही माखन इतना ज्यादा पसंद था कि वे गोपियों के घर से चुराकर भी खा लेते थे, इसलिए उन्हें माखन चोर भी कहा जाता है. वहीं, मालपुआ एक पारंपरिक मिठाई है, जिसे कई स्थानों पर जन्माष्टमी के भोग में शामिल किया जाता है. प्रेमानंद महाराज का कहना है कि इन दोनों डिशेज को बाजार से खरीदने के बजाय घर पर बनाकर भोग लगाना काफी शुभ माना जाता है.


 




 

घर पर कैसे बनाएं फ्रेश सफेद मक्खन?

जन्माष्टमी के मौके पर अगर आप कान्हा को खुश करना चाहते हैं, तो उन्हें फ्रेश मक्खन बनाकर खिलाएं. इसके लिए फ्रिज में रखी ताजी मलाई लें. इसे अच्छी तरह से फेटें, जब आप मलाई को अच्छी तरह से फेंटते हैं, तो उसमें से पानी अलग होने लगता है.इसके बाद ठंडा पानी मिलाकर दोबारा मथें. कुछ ही समय में मक्खन अलग होकर ऊपर आ जाएगा. इस माखन में थोड़ा-सा मिश्री मिलाकर भोग लगाया जा सकता है.

कान्हा को प्रिय है आटे का मालपुआ

चावल के आटे का मालपुआ तैयार करने के लिए 1 कप चावल का आटा और थोड़ा सा मैदा लें. इसमें सौंफ, इलायची पाउडर और दूध को मिक्स करके घोल तैयार कर लें. इसके बाद इसे घी में सुनहरा होने तक सेंका जाता है. दूसरी ओर चीनी और पानी की हल्की चाशनी बनाकर तैयार मालपुओं को उसमें डुबोया जाता है. ऊपर से केसर, पिस्ता और बादाम डालकर इसे और स्वादिष्ट बनाया जा सकता है.

गुरु पूर्णिमा पर ब्रह्माकुमारीज़ अम्बे-डकर नगर, गुजैनी में आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित- कानपुर 




कानपुर। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ अम्बेडकर नगर, गुजैनी कानपुर द्वारा एक भव्य आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सभी अतिथियों के तिलक द्वारा स्वागत एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

इस अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ की बीके ममता बहन ने गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्तमान समय में स्वयं शिव परमात्मा ही सच्चे सद्गुरु हैं, जो समस्त मानवता को सत्य ज्ञान प्रदान कर जीवन में सुख, शांति, पवित्रता एवं श्रेष्ठ संस्कारों का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को शिव परमात्मा का परिचय कराते हुए ईश्वरीय ज्ञान का संदेश दिया।

कार्यक्रम के दौरान शिव ध्वजारोहण किया गया। बच्चों ने आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सभी का मन मोह लिया। उत्कृष्ट प्रस्तुति देने वाले बच्चों को ईश्वरीय सौगात भेंट कर सम्मानित एवं प्रोत्साहित किया गया।

कार्यक्रम में सेवानिवृत्त जीएसटी अधिकारी नंदकिशोर जी, बीके नीतू बहन, रामजीवन वर्मा (सपा कार्यकर्ता), डॉ. सीता यादव, शालिनी, निवेदिता गुप्ता, रेखा दुबे, सोनी, अनीता यादव, नरेंद्र रामनानी जी के साथ कई श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। वहीं क्षेत्रीय गणमान्य लोगों ने भी बढ़ चढ़ कर उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

कार्यक्रम का समापन विश्व शांति, मानव कल्याण एवं आध्यात्मिक जागृति की मंगलकामनाओं के साथ हुआ।

 

गोविंद नगर में शनि धाम मंदिर स्थापना दिवस पर निकली भव्य शोभा यात्रा, प्राण प्रतिष्ठा संपन्न
गोविंद नगर में शनि धाम मंदिर स्थापना दिवस पर निकली भव्य शोभा यात्रा, प्राण प्रतिष्ठा संपन्न

कानपुर के गोविंद नगर 8 ब्लॉक स्थित शनि धाम मंदिर में 21 अप्रैल को स्थापना दिवस के अवसर पर भगवान गणेश एवं भगवान खाटू श्याम की भव्य शोभा यात्रा निकाली गई। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और भक्तिभाव के साथ यात्रा में भाग लिया। इसके उपरांत मंदिर परिसर में भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया।

कार्यक्रम के दौरान भगवान गणेश और भगवान खाटू श्याम की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा पंडित आचार्य मदन मोहन पांडेय द्वारा मंत्रोच्चारण एवं विधि-विधान के साथ संपन्न कराई गई।

इस धार्मिक आयोजन में जूही मंडल के मंडल मंत्री डॉक्टर समरदीप पांडेय ने अपने साथियों के साथ सक्रिय सहभागिता निभाई। कार्यक्रम में वरिष्ठ नेता अनिल त्रिपाठी, अवध बिहारी अवस्थी, विनय मालवी, मंदिर पुजारी पंडित सतीश अवस्थी, पंडित अमरदीप पांडेय, सत्यदीप पांडेय, एडवोकेट गौरव, संदीप सिंह, नंदू और भोला सहित बड़ी संख्या में क्षेत्रीय श्रद्धालु उपस्थित रहे।

पूरे आयोजन का वातावरण भक्तिमय रहा और क्षेत्र में धार्मिक उत्साह देखने को मिला।

आज अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व से लेकर सोना खरीदने तक आज क्या-क्या करें

आज अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, महत्व से लेकर सोना खरीदने तक आज क्या-क्या करें

हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती मनाई जाती हैण् जानिए अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती पर शुभ मुहूर्तए पूजा विधिए महत्व और सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त के साथ.साथ आज दिनभर क्या.क्या करेंण्


अक्षय तृतीया एक बहुत ही शुभ पर्व हैए जिसे पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता हैण् यह त्योहार हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आता हैण् वर्ष 2026 में अक्षय तृतीया 19 अप्रैल यानी रविवार को मनाई जाएगीण् इस शुभ दिन पर लोग भगवान गणेशए भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती हैण् इसी दिन परशुराम जयंती भी मनाई जाती हैण् अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना भी बहुत शुभ माना जाता हैण् इस दिन कोई भी शुभ काम करने के लिए अलग से मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं होतीण् मान्यता है कि आज के दिन किए गए कामए दान या निवेश का फल कभी खत्म नहीं होताण् यह लगातार बढ़ता रहता हैण् चलिए आपको बताते हैं अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती पर शुभ मुहूर्तए पूजा विधिए महत्व और सोना खरीदने का शुभ मुहूर्त के साथ.साथ आज दिनभर क्या.क्या करेंण्

अक्षय तृतीया 2026 तिथि और समय

तृतीया तिथि शुरू- 19 अप्रैल 2026, सुबह 10:49 बजे

तृतीया तिथि समाप्त- 20 अप्रैल 2026, सुबह 7:27 बजे

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त- 10:49 बजे से 12:20 बजे तक

परशुराम जयंती 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त

तृतीया तिथि प्रारंभ: 19 अप्रैल 2026, सुबह 10:49 बजे

तृतीया तिथि समाप्त: 20 अप्रैल 2026, सुबह 07:27 बजे

Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया पर खरीदे ये चीजें

मिट्टी का बर्तन- यह मंगल ग्रह को मजबूत करता है, कर्ज मुक्ति और अड़चनों से राहत दिलाता है.

रूई- शुक्र ग्रह से संबंधित, माता लक्ष्मी की कृपा बरसती है और दरिद्रता दूर होगी है.

हल्दी की गांठ- यह गुरु ग्रह को बल देती है, जीवन में स्थिरता और सम्मान बढ़ाती है.

पीली सरसों- दरिद्रता और नकारात्मक ऊर्जा दूर करती है.

पीली कौड़ी- धन, संपत्ति और समृद्धि को आकर्षित करती है.

अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने का महत्व

अक्षय तृतीया के दिन सोना खरीदना बहुत शुभ माना जाता है. ऐसा विश्वास है कि इस दिन सोना लेने से घर में धन, सुख‑समृद्धि और खुशहाली आती है. इस दिन शुभ मुहूर्त में खरीदारी करना जरूरी माना जाता है. माना जाता है कि इससे देवी‑देवताओं का आशीर्वाद मिलता है और जीवन में उन्नति होती है.

Akshaya Tritiya 2026 LIVE: मां लक्ष्मी पूजा मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॥

ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे, विष्णुपत्नी च धीमहि, तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥

नमस्ते सर्वदेवानां वरदासि हरिप्रिये। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां सा मे भूयात्त्वदर्चनात्॥



बांके बिहारी जी की लीला अपरम्पार है

 बांके बिहारी जी की लीला अपरम्पार है 

आनंद नाम का एक लड़का रेलगाड़ी में साफ-सफाई करता था और उससे मिलने वाले पैसों से अपने घर का गुजारा करता था। उसके परिवार में एक बूढ़ी माँ, एक छोटी बहन और बीमार पिता थे।

एक दिन गाड़ी में सीटों के नीचे सफाई करते समय उसे एक पर्स मिला। पर्स हाथ में आते ही उसके हाथ कांपने लगे। उसे लगा कि इसमें बहुत सारे पैसे होंगे। उसने झटपट पर्स उठाकर अपनी जेब में डाल लिया। वह बेसब्री से गाड़ी रुकने का इंतज़ार करने लगा ताकि देख सके कि इसमें कितने पैसे हैं। वह उन पैसों से घर के लिए राशन और पिता के लिए दवाई लेना चाहता था।

स्टेशन आते ही वह उतरा और एक एकांत जगह जाकर पर्स खोला। देखते ही उसके होश उड़ गए; पर्स बिल्कुल खाली था। उसकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। तभी पर्स की पिछली जेब में उसे एक भगवान की तस्वीर दिखी। उस तस्वीर को देखते ही उसके भीतर एक अजीब सी हलचल हुई और उसकी आँखों से दो मोटे आँसू निकलकर तस्वीर के चरणों में जा गिरे। ये आँसू खाली पर्स के दुख के थे या उस छवि के प्रति भक्ति के, वह समझ न पाया।

वह थके हुए कदमों से घर की ओर चल दिया। वह सोच रहा था कि आज घर में खाने को कुछ नहीं है, माँ-बहन भूखी हैं और पिता को दवाई के लिए भोजन चाहिए। तभी गली के नुक्कड़ पर एक सेठ शादी का बचा हुआ खाना बाँट रहा था। आनंद भी लाइन में लग गया और उसे खाने के दो-तीन पैकेट मिल गए। वह बहुत खुश हुआ। घर जाकर जब उसने माँ को खाना दिया, तो माँ ने बताया कि बहन भूख से रो रही थी।

आनंद हैरान था कि जो सेठ उसे देखकर मुँह सिकोड़ता था, आज उसने खुद उसे खाना दिया। उसने जेब से वह तस्वीर निकाली और भगवान का धन्यवाद किया। अगले दिन आनंद को स्टेशन पर एक बीमार वृद्धा मिली। उसने आनंद को टिकट लाने के लिए 500 रुपये दिए। जब आनंद टिकट लेकर लौटा, तब तक गाड़ी चलने लगी थी। उसने खिड़की से वृद्धा को टिकट थमाया, पर बाकी के 275 रुपये उसके हाथ में ही रह गए। वृद्धा ने इशारा किया कि वह पैसे आनंद रख ले। आनंद ने उन पैसों से हफ्ते भर का राशन खरीदा। उसे यकीन होने लगा कि यह सब उस तस्वीर वाले भगवान का चमत्कार है।

जब उसने माँ से पूछा कि ये कौन से भगवान हैं, तो माँ राशन देखकर इतनी खुश थी कि उसने ध्यान नहीं दिया। कुछ दिन बाद ट्रेन में सफाई करते समय उसने कुछ भक्तों को उसी तस्वीर के साथ 'हरे कृष्ण' का जाप करते देखा। पूछने पर एक महिला ने बताया, "बेटा, ये बांके बिहारी जी हैं। ये वृन्दावन के मालिक हैं और सबकी मनोकामना पूरी करते हैं।" आनंद ने भी वृन्दावन जाने की जिद की और वह उनके साथ चल दिया।

वृन्दावन पहुँचकर आनंद लोगों से बिहारी जी का पता पूछने लगा। एक सज्जन उसे मंदिर ले गए। मंदिर में भारी भीड़ थी। आनंद को दूर से ही बिहारी जी की झलक मिली और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। तभी मंदिर की बत्ती (लाइट) चली गई। अंधेरे में उसे एक दिव्य रोशनी दिखी और महसूस हुआ कि कोई उसका हाथ खींच रहा है। एक छोटे बालक ने उसे कोने में ले जाकर कहा, "आनंद, मैं कब से तुम्हारी राह देख रहा हूँ।"

आनंद घबरा गया। बालक बोला, "मैं वही हूँ जिसकी तस्वीर तुम जेब में लिए घूमते हो। जिस दिन तुम्हारे आँसुओं ने मेरे पैर धोए थे, उसी दिन से तुम मेरी शरण में हो।" आनंद को अपने परिवार की चिंता हुई, तो बिहारी जी बोले, "चिंता मत कर। जिस बस्ती में तुम रहते थे, वहाँ एक सेठ को मंदिर बनाना था। उसने तुम्हारी झोपड़ी के बदले तुम्हारे परिवार को पक्का घर और खाने का प्रबंध कर दिया है। अब तुम यहीं रहो और मेरे लिए फूलों की माला बनाया करो।"

जब आनंद ने आँखें खोलीं, तो बालक गायब था और बिहारी जी अपनी जगह विराजमान थे। आनंद की आँखों से अश्रुधारा बह निकली और वह 'बांके बिहारी लाल की जय' पुकारने लगा।



 

शनिदेव लंगड़े क्यों और उन पर तेल चढ़ाने की परंपरा क्यों?

शनिदेव लंगड़े क्यों और उन पर तेल चढ़ाने की परंपरा क्यों?

शनिदेव दक्ष प्रजापति की पुत्री संज्ञा देवी और सूर्यदेव के पुत्र हैं। यह नवग्रहों में सबसे अधिक भयभीत करने वाला ग्रह है। इसका प्रभाव एक राशि पर ढाई वर्ष और साढ़े साती के रूप में लंबी अवधि तक भोगना पड़ता है। शनिदेव की गति अन्य सभी ग्रहों से मंद होने का कारण इनका लंगड़ाकर चलना है। वे लंगड़ाकर क्यों चलते हैं, इसके संबंध में सूर्यतंत्र में एक कथा है-एक बार सूर्य देव का तेज सहन न कर पाने की वजह से संज्ञा देवी ने अपने शरीर से अपने जैसी ही एक प्रतिमूर्ति तैयार की और उसका नाम स्वर्णा रखा। उसे आज्ञा दी कि तुम मेरी अनुपस्थिति में मेरी सारी संतानों की देखरेख करते हुए सूर्य देव की सेवा करो और पत्नी सुख भोगो। ये आदेश देकर वह अपने पिता के घर चली गई। स्वर्णा ने भी अपने आप को इस तरह ढाला कि सूर्य देव भी यह रहस्य न जान सके। इस बीच सूर्य देव से स्वर्णा को पांच पुत्र और दो पुत्रियां हुई। स्वर्णा अपने बच्चों पर अधिक और संज्ञा की संतानों पर कम ध्यान देने लगी।

एक दिन संज्ञा के पुत्र शनि को तेज भूख लगी, तो उसने स्वर्णा से भोजन मांगा तब स्वर्णा ने कहा कि अभी ठहरो, पहले मैं भगवान् का भोग लगा लूं और तुम्हारे छोटे भाई-बहनों को खिला दूं, फिर तुम्हें भोजन दूंगी। यह सुनकर शनि को क्रोध आ गया और उन्होंने माता को मारने के लिए अपना पैर उठाया, तो स्वर्णा ने शनि को श्राप दिया कि तेरा पांव अभी टूट जाए। माता का श्राप सुनकर शनिदेव डरकर अपने पिता के पास गए और सारा किस्सा कह सुनाया। सूर्यदेव तुरंत समझ गए कि कोई भी माता अपने पुत्र को इस तरह का शाप नहीं दे सकती। इसलिए उनके साथ उनकी पत्नी नहीं, कोई और है। सूर्य देव ने क्रोध में आकर पूछा कि 'बताओ तुम कौन हो?' सूर्य का तेज देखकर स्वर्णा घबरा गई और सारी सच्चाई उन्हें बता दी। तब सूर्यदेव ने शनि को समझाया कि स्वर्णा तुम्हारी माता नहीं है, लेकिन मां समान है। 

इसलिए उनका दिया शाप व्यर्थ तो नहीं होगा, परंतु यह इतना कठोर नहीं होगा कि टांग पूरी तरह से अलग हो जाए। हां, तुम आजीवन एक पांव से लंगड़ाकर चलते रहोगे।

शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाया जाता है, इस संबंध में आनंद रामायण में एक कथा का उल्लेख मिलता है। जब भगवान् राम की सेना ने सागर सेतु बांध लिया, तब राक्षस इसे हानि न पहुंचा सकें, उसके लिए पवनसुत हनुमान को उसकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई। जब हनुमान जी शाम के समय अपने इष्टदेव राम के ध्यान में मग्न थे, तभी सूर्य पुत्र शनि ने अपना काला कुरूप चेहरा बनाकर क्रोधपूर्वक कहा-'हे | वानर ! मैं देवताओं में शक्तिशाली शनि हूं। सुना है, तुम बहुत बलशाली हो। आंखें खोलो और मुझसे युद्ध करो, मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूं।' इस पर हनुमान ने विनम्रतापूर्वक कहा-'इस समय में अपने प्रभु का ध्यान कर रहा हूँ। आप मेरी पूजा में विघ्न मत डालिए। आप मेरे आदरणीय कृपा करके यहां से चले जाइए।

जब शनि लड़ने पर ही उतर आए, तो हनुमान ने शनि को अपनी पूंछ में लपेटना शुरू कर दिया। फिर उसे कसना प्रारंभ कर दिया। जोर लगाने पर भी शनि उस बंधन से मुक्त न होकर पीड़ा से व्याकुल होने लगे। हनुमान जी ने फिर सेतु की परिक्रमा शुरू कर शनि के घमंड को तोड़ने के लिए पत्थरों पर पूंछ को झटका दे-दे कर पटकना शुरू कर दिया। इससे शनि का शरीर लहूलुहान हो गया, जिससे उनकी पीड़ा बढ़ती गई। तब शनिदेव ने हनुमान जी से प्रार्थना की कि मुझे बंधन मुक्त कर दीजिए मैं अपने अपराध की सजा पा चुका हूं। फिर मुझसे ऐसी गलती नहीं होगी।

इस पर हनुमान जी बोले-मैं तुम्हें तभी छोडूंगा, जब तुम मुझे वचन दोगे कि श्रीराम के भक्त को कभी परेशान नहीं करोगे। यदि तुमने ऐसा किया, तो मैं तुम्हें कठोर दंड दूंगा।' शनि ने गिड़गिड़ाकर कहा-मैं वचन देता हूं कि कभी भूलकर भी आपके और श्रीराम के भक्त की राशि पर नहीं आऊंगा। आप मुझे छोड़ दें। तब हनुमान ने शनिदेव को छोड़ दिया। फिर हनुमान जी से शनिदेव ने अपने घावों की पीड़ा मिटाने के लिए तेल मांगा। हनुमान् ने जो तेल दिया, उसे घाव पर लगाते ही शनिदेव की पीड़ा मिट गई। उसी दिन से शनिदेव को तेल चढ़ता है, जिससे उनकी पीड़ा शांत हो जाती है और वे प्रसन्न हो जाते हैं।

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इस बार चैत्र नवरात्रि 8 दिन, इस ज्योतिषीय वजह को जानते हैं आचार्य दिनेश नारायण पाण्डेय से

इस बार चैत्र नवरात्रि 8 दिन, इस ज्योतिषीय वजह को जानते हैं आचार्य दिनेश नारायण पाण्डेय से

इस बार नवरात्रि 9 नहीं बल्कि 8 दिन की होगीण् इसके पीछे की क्या वजह हैए इसी के बारे में आज हम आपको आगे आर्टिकल में बता रहे हैं.

Chaitra Navratri 2025 : इस साल चैत्र नवरात्रि 30 मार्च से शुरू हो रही है. इस दौरान मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूरे विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की जाएगी. इस दौरान सच्चे मन से मां दुर्गा की आराधना करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मां का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है. नवरात्रि का आठवां और नौवां दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है. इन दोनों तिथियों में कन्या पूजन किया जाता है. लेकिन इस बार अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ रही है. यानी इस बार नवरात्रि 9 नहीं बल्कि 8 दिन की होगी. इसके पीछे की क्या वजह है, इसी के बारे में आज हम आपको आगे आर्टिकल में बता रहे हैं.

चैत्र नवरात्रि 8 दिन की क्यों - Why is Chaitra Navratri of 8 days?

आपको बता दें कि इस बार तृतीया तिथि का क्षय हो रहा है. जिसके कारण अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग एक साथ बन रहा है. इस प्रकार 5 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि की अष्टमी तिथि का पूजन किया जाएगा और इस दिन ही कन्या पूजन भी होगा.

चैत्घर नवरात्रि घटस्थापना मुहूर्त 2025 - Kalash sthapna muhurat 2025

आपको बता दें कि नवरात्रि का पर्व घटस्थापना के साथ शुरू होता है. 30 मार्च को कलश स्थापना मुहूर्त सुबह 6 बजकर 13 मिनट से सुबह 10 बजकर 22 मिनट तक है फिर अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 1 मिनट से 12 बजकर 50 मिनट तक है. 

चैत्र नवरात्रि अष्टमी मंत्र - Ashtami mantra's

अष्टमी मंत्र

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।। 

या देवी सर्वभूतेषु मां गौरी रूपेण संस्थिता। 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

बीज मंत्र

श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।

पूजन मंत्र

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचि:। 
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा।।

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। 

शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।







चैत्र नवरात्रि नियम - Rules related to Chaitra Navratri fast

  • नवरात्रि के समय तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए.
  • शराब, तंबाकू और मांसाहारी चीजें घर में नहीं लाएं.
  • नाखून, बाल और दाढ़ी काटने से बचें.
  • 9 दिन तक खाने में सरसों और तिल का सेवन नहीं करें. 
  • व्रत के दौरान सेंधा नमक का सेवन करें. 
  • चमड़े से बनी चीजों का इस्तेमाल नहीं करें. 
  • नवरात्रि के दौरान काले रंग के कपड़े नहीं पहनें.
  • किसी से झूठ और अपशब्द न बोलें. 
  • नवरात्रि के समय घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें. 
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य ,राय ,पूजन का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने  पुरोहित से परामर्श करें. B.I.News (www.newsbin24.com) इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)


खाटूश्याम जी मंदिर पर कैसे शुरू हुई निशान चढ़ाने की परंपरा? झूंझुनू के सूरजगढ़ से है खास कनेक्शन

खाटूश्याम जी मंदिर पर कैसे शुरू हुई निशान चढ़ाने की परंपरा? झूंझुनू के सूरजगढ़ से है खास कनेक्शन

Khatu Shyam Nishan Yatra 2025: यह निशान फागुन शुक्ल छठ व सप्तमी के दिन सूरजगढ़ से रवाना होता है और द्वादशी के दिन खाटूश्याम के मंदिर के शिखर पर चढ़ाया जाता है. इसके अलावा किसी भी ध्वज को खाटूश्याम मंदिर के शीर्ष पर जगह नहीं मिलती है.





राजस्थान में फाल्गुन माह में खाटू श्याम का लक्खी मेला परवान पर है. देश-विदेश से श्रद्धालु खाटू श्याम निशान लेकर बाबा को अर्पित कर रहे हैं. आज हम आपको बताने जा रहे उस निशाना की कहानी जो खाटूधाम के मंदिर के शिखर बंद पर 12 महीने लहरता है. वो निशान जिसका डंका बाबा के खाटूधाम की तरह पूरे विश्व में बजता है. इसके साथ ही हम आपको ऐसे बाबा श्याम के भक्त के बारे में भी बताएंगे जिसने पूरे विश्व में सूरजगढ़ के निशान को ख्याति दिलवाई. इतना ही नहीं, अंग्रेजी हुकूमत के भी छक्के छुड़ा दिए. देखिये ये रिपोर्ट...

खाटू श्याम मंदिर के शिखर पर चढ़ने वाला सूरजगढ़ का निशान हजारों पदयात्रियों के साथ खाटू के लिए रवाना हो गया है. निशान के साथ देश-विदेश के श्रद्धालु भी शामिल हुए हैं. खाटू से सूरजगढ़ का खास रिश्ता है. बात चाहे मुगलों के समय की हो या फिर अंग्रेजों के समय की, जब-जब भी मंदिर पर हमले की बात हो या फिर खाटू में दर्शनों पर में रूकावट की कोशिश की गई हो, सूरजगढ़ के श्याम भक्तों ने सबका मुकाबला किया और दर्शनों को रूकने नहीं दिया. 

पिछले कई वर्षों से लगातार खाटू श्याम जाने वाले और लगातार निशान उठाने वाले किदवई नगर के रहने वाले प्रखर मिश्रा उर्फ टोनी बताते है कि वो और उनकी पूरी भक्तों की टीम पिछले कई वर्षों से खाटू नरेश के दर्शन के लिए जाते हैं और जैसा कि वो बताते हैं कि खाटू श्याम जी सच में हारे का सहारा हैं जब से वो और उनके मित्र श्री खाटू नरेश भगवान जी के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं उनके प्रयासों में लगातार चार चॉद लग रहे है और वहॉ जाने का वो पूरा श्रेय भी खाटू नरेश जी को ही देते है और अगली बार कब जा रहे है पूॅछने पर बोले कि जब तक श्री खाटू नरेश जी बुलाते रहेंगे तब तक जाते रहेंगे।

कैसे शुरू हुई निशान चढ़ाने की परंपरा?

श्याम भगत मोहन लाल इंदौरिया की मानें तो अंग्रेजों के जमाने में बाबा श्याम के दरबार में आस्था के सैलाब को देखकर अंग्रेजी हुकूमत ने खाटू मंदिर में ताला लगा दिया था. तब एक भक्त मंगलाराम निशान लेकर खाटू पहुंचे. अपने गुरु गोर्धनदास का आदेश पाकर उसने बाबा श्याम का नाम लेकर मोर पंख ताले पर मारा तो ताला खुल गया. यह चमत्कार देख अंग्रेजी हुकूमत ने पैर पीछे कर लिए. दरअसल, अंग्रेज बाबा के दर्शन में रूकावट पैदा करवाना चाह रहे थे. लेकिन सूरजगढ़ के श्याम भक्त मंगलाराम ने ऐसा नहीं होने दिया और बाबा की शक्ति से अंग्रेजों के छक्के छुड़वा दिए. माना जाता हैं की सूरजगढ़ निशान में खुद बाबा श्याम चलते हैं. मंदिर कमेटी ने सूरजगढ़ के निशान को बाबा के मुख्य शिखर पर चढ़ाने का निर्णय लिया जो परंपरा आज भी निभाई जा रही है.

सूरजगढ़ के निशान को खाटू के श्याम दरबार में मुख्य शिखर पर चढ़ाया जाता है. यही एकमात्र निशान है जो पूरे वर्ष बाबा के मुख्य शिखर पर लहराता है.

सिर पर सिगड़ी रखकर 152 KM चलती हैं महिलाएं

सूरजगढ़ के इस प्राचीन निशान की मान्यता है कि इस निशान के आगे-आगे महिलाएं अपनी मन्नत साथ लेकर सिर पर सिगड़ी रख चलती हैं. महिलाओं का कहना है कि जो भी बाबा श्याम से मांगतीं हैं, वो उन्हें मिलता है. महिलाएं निशान यात्रा में 152 किलोमीटर तक नाचते-गाते चलती हैं. सिगड़ी बाबा के दरबार में अर्पित की जाती है. पूरे देश में सिर्फ सूरजगढ़ का ही ऐसा निशान होता है, जहां पर महिलाएं अपनी मन्नत पूरी होने पर बाबा श्याम को सिगड़ी अर्पित करती हैं और पूरे रास्ते सिर पर सिगड़ी रखकर पदयात्रा पूरी करती हैं. ये महिलाएं पूरे रास्ते बाबा के भजनों पर नाचते-गाते श्रद्धाभाव के साथ पहुंचती हैं.

निशान यात्रा में शामिल होते हैं देश-विदेश के श्रद्धालु

ऐसे कई चमत्कार और इतिहास सूरजगढ़ के निशान के साथ जुड़े हुए हैं. यही कारण है कि इस निशान में शामिल होने के लिए ना केवल देश, बल्कि देश के बाहर से भी श्यामभक्त सूरजगढ़ पहुंचते हैं. यह निशान फागुन शुक्ल छठ व सप्तमी के दिन सूरजगढ़ से रवाना होता है और द्वादशी के दिन खाटूश्याम के मंदिर के शिखर पर चढ़ाया जाता है. इसके अलावा किसी भी ध्वज को खाटूश्याम मंदिर के शीर्ष पर जगह नहीं मिलती है.

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