पिता है तो सब कुछ है
प्रिंसिपल ने माता-पिता को स्कूल बुलाकर कहा, "आज हमने बच्चों से 'मेरे पापा' पर निबंध लिखवाया था... लेकिन आपके बेटे की कॉपी पढ़कर पूरा स्टाफ रो पड़ा।"
माँ और पिता दोनों घबराकर कुर्सी पर बैठ गए।
प्रिंसिपल ने धीरे से कॉपी उनके हाथ में रख दी।
ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—
"मेरे पापा"
"मेरे पापा बहुत अजीब इंसान हैं।
उनके दो हाथ हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।
उनकी दो आँखें हैं, लेकिन मैं उन्हें कई बार रात को चुपके से रोते हुए देख चुका हूँ।
उनके पास एक पुरानी घड़ी है, जो हमेशा पाँच मिनट पीछे रहती है। शायद इसलिए क्योंकि मेरे पापा हमेशा अपनी खुशियों से भी पीछे रह जाते हैं।
मेरे पापा मुझे कहते हैं कि मैं दुनिया का सबसे अमीर बेटा हूँ। लेकिन मुझे पता है कि उन्होंने पिछले तीन साल से अपने लिए नए जूते नहीं खरीदे।
माँ कहती हैं कि तुम्हारे पापा बहुत ज़िद्दी हैं। दादी कहती हैं कि बचपन से ही ऐसे हैं। पड़ोसी कहते हैं कि तुम्हारे पापा बड़े स्वाभिमानी आदमी हैं, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते।
लेकिन मुझे लगता है कि मेरे पापा जादूगर हैं।
क्योंकि महीने की आख़िरी तारीख़ में भी घर का राशन आ जाता है... मेरी फीस भर जाती है... मेरी किताबें आ जाती हैं... लेकिन उनके लिए कभी कुछ नहीं आता।
एक दिन मैंने उनसे पूछा था— 'पापा, आप नया मोबाइल कब लोगे?'
उन्होंने हँसकर कहा— 'जब मेरा बेटा बड़ा अफसर बन जाएगा।'
उस दिन मैंने देखा था कि उनका मोबाइल पीछे से टूट चुका था और स्क्रीन पर दरारें थीं।
एक रात मैं पानी पीने उठा। पापा बरामदे में बैठे थे। उनके हाथ में बिजली का बिल था और आँखों में आँसू।
उन्होंने मुझे देखकर तुरंत मुस्कुरा दिया और बोले— 'मच्छर बहुत हैं, इसलिए बाहर बैठा हूँ।'
मुझे पता था कि वह झूठ बोल रहे हैं।
स्कूल में जब दोस्त अपने पापा की बड़ी-बड़ी कारों की बातें करते हैं, तब मैं चुप रहता हूँ।
क्योंकि मेरे पापा के पास कार नहीं है... लेकिन उन्होंने मुझे अपने कंधों पर बैठाकर पूरी दुनिया दिखा दी है।
कुछ दिन पहले मेरी गलती से उनका चश्मा टूट गया था। मैंने सोचा था कि वह मुझे बहुत डाँटेंगे।
लेकिन उन्होंने कहा— 'कोई बात नहीं बेटा, पुराना ही तो था।'
दो दिन बाद मैंने देखा कि वह बिना चश्मे के ही काम पर चले गए।
उनकी आँखें बार-बार सिकुड़ रही थीं, फिर भी उन्होंने नया चश्मा नहीं बनवाया।
मेरे जन्मदिन पर उन्होंने मुझे साइकिल दिलाई।
मैं बहुत खुश था।
लेकिन उसी रात मैंने माँ को कहते सुना— 'तुमने अपनी दवाई फिर नहीं खरीदी?'
पापा हँसकर बोले— 'अरे, हल्का-सा दर्द ही तो है... ठीक हो जाएगा।'
मुझे तब समझ आया कि मेरी साइकिल उनकी दवाई से ज़्यादा महँगी थी।
अब मैं बड़ा होकर डॉक्टर नहीं, अफसर नहीं... सबसे पहले अपने पापा का बेटा बनना चाहता हूँ।
ताकि एक दिन मैं उनसे कह सकूँ—
'पापा... अब आपकी बारी है।'
'अब आप अपनी दवाई भी लेंगे, नया चश्मा भी बनवाएँगे, नए जूते भी पहनेंगे और पहली बार बिना खर्च गिने अपनी पसंद की मिठाई भी खाएँगे।'
अगर भगवान सच में कहीं हैं, तो मैं उनसे बस एक ही दुआ माँगूँगा—
'अगले जन्म में भी मुझे यही पापा देना... क्योंकि दुनिया में सबसे अमीर इंसान वही होता है, जिसके सिर पर पिता का हाथ होता है।'"
निबंध पढ़ते-पढ़ते माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने पहली बार अपने पति की ओर देखा।
उन्हें याद आया कि सचमुच पिछले कई वर्षों से उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।
हर त्योहार पर बच्चों के कपड़े आए...
पत्नी की साड़ी आई...
घर का सामान आया...
लेकिन उनके हिस्से में हमेशा वही पुरानी शर्ट, वही घिसे हुए जूते और वही मुस्कान आई।
प्रिंसिपल की आँखें भी नम थीं।
उन्होंने धीमे से कहा—
"हम बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन आज आपके बेटे ने हम सबको जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।"
घर लौटते समय माँ ने रास्ते में पति का हाथ पकड़ लिया।
पति हैरान होकर बोले, "क्या हुआ?"
पत्नी रोते हुए बोली—
"आज तक मैं यह गिनती रही कि तुमने मुझे क्या नहीं दिया... लेकिन कभी यह नहीं देखा कि तुमने अपने हिस्से का कितना कुछ छोड़ दिया।"
उस शाम कई सालों बाद पूरा परिवार एक साथ बैठा।
न कोई शिकायत थी...
न कोई ताना...
सिर्फ़ अपनापन था।
बेटा दौड़कर आया और अपने पापा से लिपट गया।
पिता ने उसे सीने से लगाया, लेकिन इस बार उनकी आँखों के आँसू किसी ने छिपाने नहीं दिए।
कहते हैं, माँ घर का दिल होती है... लेकिन पिता वह खामोश दीवार होते हैं, जिन पर पूरा घर टिका होता है।
जो पिता अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर बच्चों के सपनों को साँस देते हैं, उन्हें जीवन में रहते हुए सम्मान दीजिए... क्योंकि उनके जाने के बाद सबसे ज़्यादा चुभती है उनकी वही खामोशी, जिसे हम कभी समझ ही नहीं पाए।
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