पिता के जेल जाने की सजा बच्ची को नहीं दे सकता स्कूल; हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कक्षा में बैठाने के निर्देश

पिता के जेल जाने की सजा बच्ची को नहीं दे सकता स्कूल; हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कक्षा में बैठाने के निर्देश

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने कहा कि पिता के जेल जाने की सजा बच्ची को नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने स्कूल को छात्रा की पढ़ाई तत्काल शुरू कराने के निर्देश दिए. अगली सुनवाई इस तारीख को.

पिता के जेल जाने की सजा बच्ची को नहीं दे सकता स्कूल; हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, कक्षा में बैठाने के निर्देश

MP High Court: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की ग्वालियर खंडपीठ ने शिक्षा के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि माता-पिता की परिस्थितियों का खामियाजा किसी बच्चे को नहीं भुगतना पड़ सकता. अदालत ने गुना जिले की एक छात्रा को तत्काल स्कूल में प्रवेश देकर कक्षाओं और परीक्षा में शामिल होने की अनुमति देने के निर्देश दिए हैं. छात्रा आरटीई (राइट टू एजुकेशन) योजना के तहत पढ़ाई कर रही थी, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण कुछ समय स्कूल नहीं जा सकी. बाद में स्कूल प्रबंधन ने उसे दोबारा पढ़ाई शुरू करने से रोक दिया, जिसके खिलाफ मामला हाईकोर्ट पहुंचा.

आरटीई के तहत पढ़ रही थी छात्रा

मामला गुना जिले के शांति पब्लिक हायर सेकेंडरी स्कूल से जुड़ा है. याचिका के अनुसार छात्रा शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत विद्यालय में अध्ययनरत थी. परिवार पर आई विपरीत परिस्थितियों के कारण उसकी पढ़ाई बीच में प्रभावित हो गई. वर्ष 2021 में छात्रा की मां का निधन हो गया था, जिसके बाद परिवार पहले से ही मुश्किल दौर से गुजर रहा था.

पारिवारिक परिस्थितियों से बाधित हुई पढ़ाई

याचिका में बताया गया कि बाद में कुछ मामलों में छात्रा के पिता और परिवार के अन्य सदस्य न्यायिक हिरासत में चले गए. इसके चलते छात्रा नियमित रूप से स्कूल नहीं जा सकी. जब पिता जमानत पर रिहा होकर वापस आए और छात्रा को दोबारा स्कूल भेजा गया, तब स्कूल प्रबंधन ने उसे कक्षा में बैठने और परीक्षा देने की अनुमति देने से इनकार कर दिया.

स्कूल के रवैये को चुनौती देते हुए पहुंचा मामला हाईकोर्ट

छात्रा के पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि स्कूल का निर्णय शिक्षा के अधिकार और आरटीई कानून की भावना के विपरीत है. याचिका में आरोप लगाया गया कि स्कूल प्रबंधन को आशंका थी कि यदि भविष्य में पिता दोबारा जेल चले गए तो छात्रा की पढ़ाई एक बार फिर बाधित हो सकती है. इसी आधार पर उसे पढ़ाई जारी रखने की अनुमति नहीं दी गई.

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी बच्चे को उसके अभिभावकों की परिस्थितियों के कारण शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता. अदालत ने माना कि बच्चे का शिक्षा प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण अधिकार है और किसी भी संस्थान को मनमाने तरीके से उसे पढ़ाई से दूर रखने का अधिकार नहीं है.

तत्काल कक्षा में बैठाने के निर्देश

हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए संबंधित स्कूल को निर्देश दिए कि छात्रा को तत्काल प्रभाव से कक्षाओं में शामिल होने दिया जाए. साथ ही उसकी पढ़ाई और शैक्षणिक गतिविधियों में किसी भी तरह की बाधा उत्पन्न न की जाए.

DEO के आदेश की भी नहीं हुई थी पालना

सुनवाई के दौरान एक अहम तथ्य भी सामने आया. गुना के जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) ने 4 जून 2026 को स्कूल प्रबंधन को निर्देश दिया था कि छात्रा का प्रवेश यथावत रखा जाए और उसे पढ़ाई जारी रखने दी जाए. याचिका के अनुसार स्कूल ने जिला शिक्षा अधिकारी के इस निर्देश का भी पालन नहीं किया.

स्कूल प्रबंधन से मांगा जवाब

हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्कूल प्रबंधन से जवाब तलब किया है. अदालत यह जानना चाहती है कि जिला शिक्षा अधिकारी के आदेश के बावजूद छात्रा को स्कूल में प्रवेश और पढ़ाई की अनुमति क्यों नहीं दी गई.

3 जुलाई को होगी अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई 3 जुलाई को निर्धारित की गई है. इस दौरान स्कूल प्रबंधन अपना पक्ष अदालत के समक्ष रखेगा. उधर, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद छात्रा के लिए दोबारा शिक्षा के रास्ते खुल गए हैं.

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